Sunday, 31 May 2009

बुद्धम शरणं गच्छामि................



बुद्धम शरणं गच्छामि................
दो पल सुख से सोना चाहे पर नींद नही पल को आए
जी मचले हैं बेचैनी से ,रूह ना जाने क्यों अकुलाए
ज्वाला सी जलती हैं तन मे ,उम्मीद हो रही हंगामी .....
बुद्धम शरणं गच्छामि................

मन कहता हैं सब छोड़ दूँ मैं , पर जाने कैसे छुटेगा ये
लालच रोज़ बढ़ता जाता हैं ,लगती दरिया सी तपती रेत
जब पूरी होती एक अभिलाषा ,खुद पैदा हो जाती आगामी......
बुद्धम शरणं गच्छामि................

नयनो मे शूल से चुभते हैं, सपने जो अब तक कुवारें हैं
कण से छोटा हैं ये जीवन और थामे सागर कर हमारे हैं
पागल सी घूमती रहती इस चाहत मे जि़न्दगी बे-नामी........
बुद्धम शरणं गच्छामि................

ईश्वर हर लो मन से सारी, मोह माया जैसी बीमारी
लालच को दे दो एक कफ़न ,ईर्ष्या को बेवा की साड़ी
मैं चाहूँ बस मानव बनना ,माँगू कंठी हरि नामी ....
बुद्धम शरणं गच्छामि................


(उपरोक्त रचना कवि दीपक शर्मा की अप्रकाशित रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित @ कवि दीपक शर्मा )


Tuesday, 3 March 2009

कविता

डाल कर कुछ नीर की बूँदे अधर में
कर अकेला ही विदा अज्ञात सफ़र में
कुछ नेह मिश्रित अश्रु के कतरे बहाकर
बांधकर तन को कुछ हाथ लम्बी चीर में
डूबकर स्वजन क्षणिक विछोह पीर में
तन तेरा करके हवन को समर्पित
कुछ परम्परागत श्रद्धा सुमन करके अर्पित
धीरे -धीरे छवि तक तेरी भूल जायेंगे
काल का ऐसा भी एक दिवस आएगा
आत्मीय भी नाम तेरा भूल जायेंगे

साथ केवल कर्म होंगे, माया न होगी
सम्बन्धी क्या संग अपनी छाया न होगी
बस प्रतिक्रियायें जग की तेरे साथ होंगी
नग्न होगी आत्मा, संग काया न होगी
फिर रिश्तों के सागर में मानव खोता क्यों है
अपनी - परायी भावना लिए रोता क्यों है
जब एक न एक दिन तुझको चलना है
जो आज उदित सूर्य है और कल ढलना है

कविता

क्रोध से आखिर कब निर्माण हुआ है ?

उग्रता छीन लेती आदमीयत
धमनियों में भर देती वहशीयत
क्षण में कर जाती पलायन चेतना
और नृत्य करती रक्त में उतेजना
उतेजना से कब कोई समाधान हुआ है
क्रोध से आखिर कब निर्माण हुआ है ?

कुछ नहीं होता तपन से देखना
धुआँ उठता है बस मिलती वेदना
क्रोध में चिंगारी जब कोई घूमती
लौटकर फ़िर अपना ही घर चूमती
बाद में बर्बाद सिर्फ इंसान हुआ है
क्रोध से आखिर कब निर्माण हुआ है ?

आँखों में शोले लिए जो भी हुआ
जब भी हुआ तब बहुत बुरा हुआ
खून से लथपथ तमाम सदियाँ हुई
क्रोध में जब भी कभी खंज़र छुआ
अंत में तन अपना लहुलूहान हुआ है
क्रोध से आखिर कब निर्माण हुआ है ?

तैश सिर्फ विध्वंस का पर्याय है
क्रोध कुछ क्षण के लिए सुखाय है
उग्रता है कुछ पलों की प्रसन्नता
और कुछ देर बाद चिर - नग्नता
क्रोध से आबाद सिर्फ शमशान हुआ है
क्रोध से आखिर कब निर्माण हुआ है ?

( उपरोक्त कविता काव्य संकलन फलक दीप्ति से ली गई है )

सर्वाधिकार सुरक्षित @ कवि दीपक शर्मा

Wednesday, 25 February 2009

नज़्म

मेरे जेहन में कई बार ये ख्याल आया
की ख्वाब के रंग से तेरी सूरत संवारूँ
इश्क में पुरा डुबो दूँ तेरा हसीन पैकर
हुस्न तेरा निखारू और ज्यादा निखारूँ ।

जुल्फ उलझाऊँ कभी तेरी जुल्फ सुलझाऊँ
कभी सिर रखकर दामन में तेरे सो जाऊँ
कभी तेरे गले लगकर बहा दूँ गम अपने
कभी सीने से लिपटकर कहीं खो जाऊँ
कभी तेरी नज़र में उतारूँ मैं ख़ुद को
कभी अपनी नज़र में तेरा चेहरा उतारूँ।
इश्क में पूरा डुबो दूँ तेरा हसीन पैकर
हुस्न तेरा निखारू और ज्यादा निखारूँ ॥

अपने हाथों में तेरा हाथ लिए चलता रहूँ
सुनसान राहों पर, बेमंजिल और बेखबर
भूलकर गम सभी, दर्द तमाम, रंज सभी
डूबा तसव्वुर में बेपरवाह और बेफिक्र
बस तेरा साथ रहे और सफर चलता रहे
सूरज उगता रहे और चाँद निकलता रहे
तेरी साँसों में सिमटकर मेरी सुबह निकले
तेरे साए से लिपटकर मैं रात गुजारूँ
इश्क में पुरा डुबो दूँ हँसीन पैकर
हुस्न तेरा निखारूँ और ज्यादा निखारूँ ॥

मगर ये इक तसव्वुर है मेरी जान - जिगर
महज एक ख्वाब और ज्यादा कुछ भी नहीं
हकीकत इतनी तल्ख है की क्या बयाँ करूँ
मेरे पास कहने तलक को अल्फाज़ नहीं ।
कहीं पर दुनिया दिलों को नहीं मिलने देती
कहीं पर दरम्यान आती है कौम की बात
कहीं पर अंगुलियाँ उठाते हैं जग के सरमाये
कहीं पर गैर तो कहीं अपने माँ- बाप ॥

कहीं दुनिया अपने ही रंग दिखाती है
कहीं पर सिक्के बढ़ाते हैं और ज्यादा दूरी
कहीं मिलने नहीं देता है और ज़ोर रुतबे का
कहीं दम तोड़ देती है बेबस मजबूरी ॥
अगर इस ख़्वाब का दुनिया को पता चल जाए
ख़्वाब में भी तुझे ये दिल से न मिलने देगी
कदम से कदम मिलकर चलना तो क़यामत
तुझे क़दमों के निशान पे भी न चलने देगी ।
चलो महबूब चलो , उस दुनिया की जानिब
चलें जहाँ न दिन निकलता हो न रात ढलती
हो जहाँ पर ख्वाब हकीकत में बदलते हों
जहाँ पर सोच इंसान की न जहर उगलती हो ।।

(उपरोक्त नज़्म काव्य संकलन मंज़र से ली गई है )

नज़्म

मेरी साँसों में यही दहशत समायी रहती है
मज़हब से कौमें बँटी तो वतन का क्या होगा ।
यूँ ही खिंचती रही दीवार ग़र दरम्यान दिल के
तो सोचो हश्र क्या कल घर के आँगन का होगा ।
जिस जगह की बुनियाद बशर की लाश पे ठहरे
वो कुछ भी हो लेकिन ख़ुदा का घर नहीं होगा ।

मज़हब के नाम पर कौ़में बनाने वालों सुन लो तुम
काम कोई दूसरा इससे ज़हाँ में बदतर नहीं होगा ।
मज़हब के नाम पर दंगे, सियासत के हुक्म पे फितन
यूँ ही चलते रहे तो सोचो , ज़रा अमन का क्या होगा ।
अहले -वतन शोलों के हाथों दामन न अपना दो
दामन - रेशमी है देख लो फिर दामन का क्या होगा ।

(उपरोक्त नज़्म काव्य संकलन falakdipti से ली गई है )

कविता

शून्य से निकला है जग शून्य में खोता गया ,
शून्य के आगे अंक बस शून्य ही होता गया
गिनतियाँ ज़्यादा हो जाती, शून्य ही हो जाती हैं ,
कहते अनंत पर शून्य के ही दायरे में आती हैं,
एक शून्य के ही ध्यान से मिल जाते देवी- देवता,
बस शून्य के ही ज्ञान से जा नभ में मानव बैठता।
शून्य से उत्त्पन्न होकर “दीपक” शून्य में खो जाना है,
किसी अंक से स्थान नामुमकिन शून्य का भर पाना है।


( उपरोक्त कविता कवि दीपक शर्मा की अप्रकाशित रचना है )